पंचशील नगर का सच – भाग 3
अनसुनी शिकायतों की कहानी
2008 में प्रशासन को मिली थी शिकायत, कार्रवाई नहीं होने से बढ़ता गया नाले का अतिक्रमण
रांची: पंचशील नगर में नाले के अतिक्रमण और हर बारिश में होने वाले जलजमाव की समस्या नई नहीं है। आज जिस जलजमाव से हजारों लोग परेशान हैं, उसकी आहट करीब 18 साल पहले ही प्रशासन को मिल चुकी थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि समय रहते कार्रवाई होती तो शायद आज हालात इतने गंभीर नहीं होते।
वर्ष 2008 में स्थानीय लोगों ने तत्कालीन रांची उपायुक्त को लिखित शिकायत देकर बताया था कि पंचशील नगर के नाले की जमीन पर लगातार अतिक्रमण किया जा रहा है। शिकायत में कहा गया था कि कुछ लोग बांस-बल्ली लगाकर नाले की जमीन घेर रहे हैं, जबकि कुछ लोगों ने स्थायी निर्माण भी कर लिया है। शिकायतकर्ताओं ने यह भी बताया था कि अतिक्रमण के कारण नाले का बहाव प्रभावित हो रहा है और गंदा पानी लोगों के घरों में घुस रहा है।
स्थानीय लोगों की शिकायत के बाद नगर निगम हरकत में आया और 25 जुलाई 2008 को दो लोगों के खिलाफ नोटिस जारी किया गया। उस समय लोगों को लगा कि अब नाले की जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया जाएगा और भविष्य में होने वाली बड़ी समस्या को टाला जा सकेगा। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि नोटिस जारी होने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। न तो अतिक्रमण हटाया गया और न ही नाले की जमीन को सुरक्षित करने की दिशा में कोई प्रभावी कदम उठाया गया।
जब पहली शिकायत का कोई परिणाम नहीं निकला तो 7 मई 2009 को मुहल्लेवासियों ने एक बार फिर नगर निगम में लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में कहा गया कि नाले पर बने मकानों और अन्य निर्माणों के कारण पानी की निकासी बाधित हो रही है। बरसात के दिनों में पानी लोगों के घरों में घुस रहा है और स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। लोगों ने तत्काल कार्रवाई की मांग की, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार इस शिकायत के बाद भी कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया गया।
मुहल्लेवासियों का कहना है कि इसके बाद भी शिकायतों और आवेदनों का सिलसिला वर्षों तक जारी रहा। कभी नगर निगम, कभी अंचल कार्यालय तो कभी जिला प्रशासन के समक्ष लोगों ने अपनी बात रखी। लेकिन अतिक्रमण पर प्रभावी रोक नहीं लग सकी। नतीजा यह हुआ कि नाले पर कब्जे का दायरा लगातार बढ़ता गया और जल निकासी का प्राकृतिक मार्ग सिकुड़ता चला गया।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस पूरी कहानी का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह रहा कि वर्षों तक कार्रवाई नहीं होने से लोगों का कानून और व्यवस्था से भरोसा कमजोर पड़ने लगा। जिन लोगों ने कभी नाले को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग की थी, उनमें से कुछ लोग भी बाद के वर्षों में नाले की जमीन पर निर्माण करने लगे। लोगों का कहना है कि जब शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो अतिक्रमण करने वालों का मनोबल बढ़ता गया और नाले की जमीन पर कब्जा एक सामान्य बात बनती चली गई।
समय के साथ नाले का स्वरूप बदलता गया। जहां कभी बरसाती और गंदे पानी की निकासी के लिए पर्याप्त जगह थी, वहां धीरे-धीरे निर्माण खड़े होते गए। स्थानीय लोगों का दावा है कि अतिक्रमण बढ़ने के साथ-साथ जलजमाव की समस्या भी बढ़ती चली गई। आज स्थिति यह है कि थोड़ी देर की बारिश में ही पंचशील नगर चौक और एनएच-75 का बड़ा हिस्सा जलमग्न हो जाता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि वर्ष 2008 और 2009 में की गई शिकायतों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई होती, तो नाले को बचाया जा सकता था और आज की समस्या इतनी विकराल नहीं होती। उनका कहना है कि प्रशासनिक उदासीनता और लगातार टलती कार्रवाई ने अतिक्रमण को बढ़ावा दिया।
पंचशील नगर की यह कहानी सिर्फ नाले के अतिक्रमण की कहानी नहीं है, बल्कि उन शिकायतों की भी कहानी है जो वर्षों तक फाइलों में दबकर रह गईं। स्थानीय लोगों का कहना है कि नाले को बचाने और अतिक्रमण हटाने की मांग करने वाले कई बुजुर्ग आज इस दुनिया में नहीं हैं। उन्होंने वर्षों तक कार्रवाई की उम्मीद की, आवेदन दिए, अधिकारियों के चक्कर लगाए, लेकिन उनकी मांगें अधूरी रह गईं।
आज सवाल उठ रहा है कि जब प्रशासन को पहले ही खतरे की जानकारी थी, तो फिर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आखिर उन शिकायतों का क्या जो वर्षों तक फाइलों में दबी है ? और क्या समय पर कार्रवाई होती तो आज पंचशील नगर की तस्वीर कुछ और होती?
अगले भाग में...
साल 2024 जब पंचशील के मुद्दे की लगातार आवाज़ उठाई
पढ़ते रहिए — "पंचशील नगर का सच"
— रिपोर्टिंग: मनोज मिश्रा


