पंचशील नगर का सच – भाग 2
परती नाले की जमीन कैसे बनी रैयती?
जिस जमीन को सरकारी रिकॉर्ड में "परती नाली" बताया गया, उसी पर आज खड़े हैं मकान और दुकानें
रांची: राष्ट्रीय राजमार्ग-75 पर स्थित पंचशील नगर चौक हर बारिश में जलजमाव की गंभीर समस्या से जूझता है। बारिश होते ही सड़क तालाब में बदल जाती है, यातायात प्रभावित होता है और लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन क्या इस समस्या की जड़ दशकों पुराने भूमि हस्तांतरण और नाले की जमीन पर हुई बसावट में छिपी है?
पुराने राजस्व अभिलेखों की पड़ताल में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो गंभीर सवाल खड़े करते हैं। झारभूमि के रिकॉर्ड के अनुसार खाता संख्या-210, प्लॉट संख्या-1075 की 39 डिसमिल भूमि "परती नाली" के रूप में दर्ज है। वर्ष 1932 के खतियान में भी इस भूमि का स्वरूप परती नाला बताया गया है। यानी सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यह भूमि जल निकासी मार्ग का हिस्सा थी।
लेकिन दस्तावेज़ों के अनुसार वर्ष 1975 में एक सादा हुकुमनामा के आधार पर पंचशील नगर चौक के नाले की भूमि की रजिस्ट्री जगदीश्वर दयाल सिंह के नाम कर दी गई। रजिस्ट्री का विवरण बुक नंबर-1, वॉल्यूम नंबर-140, पृष्ठ संख्या 592 से 595 तथा डीड नंबर-12345/1975 में दर्ज है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि रजिस्ट्री दस्तावेज़ में भी भूमि की प्रकृति "परती नाली" दर्ज होने के बावजूद इसका रैयतीकरण कैसे हुआ? बाद के वर्षों में यही जमीन अन्य लोगों के नाम हस्तांतरित होती चली गई और धीरे-धीरे यहां मकान, दुकानें तथा अन्य निर्माण खड़े हो गए।
आज जहां पक्के निर्माण दिखाई देते हैं, वहीं कभी नाले की जमीन दर्ज थी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जल निकासी के प्राकृतिक मार्ग पर हुए निर्माण ने पानी के बहाव को प्रभावित किया? क्या इसी कारण पंचशील नगर चौक और एनएच-75 हर वर्ष जलजमाव की समस्या से जूझ रहे हैं?
दस्तावेज़ों की यह कहानी केवल जमीन की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है। यह कहानी उस नाले की भी है, जो कभी पानी निकासी का प्रमुख रास्ता था और जिसकी जमीन आज सवालों के घेरे में है।
सवाल उठता है कि जब भूमि परती नाली के रूप में दर्ज थी, तो उसका रैयतीकरण किस आधार पर हुआ? क्या रजिस्ट्री और रैयतीकरण के समय सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था? नाले की जमीन पर निर्माण कब और कैसे बढ़ा?
अगले भाग में...
नाले की जमीन पर अतिक्रमण का विरोध पहली बार कब हुआ?
पढ़ते रहिए — "पंचशील नगर का सच"


