म्यूटेशन के सवाल पर बौखलाए डाक विभाग के निदेशक! जवाब देने के बजाय मीडिया पर ही बरस पड़े
शहीद चौक स्थित डाकघर की जमीन का आज तक नहीं हुआ म्यूटेशन, सवाल पूछते ही छूट गया अधिकारी का धैर्य
रांची: आम लोगों को जमीन का म्यूटेशन कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। दस्तावेजों में छोटी सी कमी होने पर आवेदन लौटा दिए जाते हैं और नियमों का हवाला देकर कार्रवाई रोक दी जाती है। लेकिन जब बात खुद सरकारी विभागों की आती है तो नियम-कानून मानो फाइलों में दफन हो जाते हैं।
राजधानी रांची के शहीद चौक स्थित डाकघर (जीपीओ) की जमीन का म्यूटेशन आज तक नहीं हो सका है। इसी मुद्दे पर जब झारखंड सर्किल के निदेशक डॉ. बी.आई.चौधरी से सवाल पूछा गया तो जवाब देने के बजाय उनका गुस्सा मीडिया पर फूट पड़ा।
सवाल बेहद सामान्य था—क्या शहीद चौक स्थित डाकघर की जमीन का म्यूटेशन हुआ है?
लेकिन इसका सीधा जवाब देने के बजाय निदेशक महोदय पहले अनभिज्ञता जताने लगे। उन्होंने कहा कि वे उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और उन्हें यह नहीं मालूम कि शहीद चौक कहां है। सवाल यह है कि जिस अधिकारी को झारखंड डाक सर्किल की जिम्मेदारी सौंपी गई है, वह राजधानी के सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक चौक से ही अनजान कैसे हो सकता है और वह भी जहां उसका जीपीओ हो।
जब संवाददाता ने उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर सवाल आगे बढ़ाया तो निदेशक महोदय और अधिक असहज हो गए। जवाब देने के बजाय उन्होंने उल्टे पत्रकार से पूछना शुरू कर दिया कि म्यूटेशन नहीं होने की जानकारी कहां से मिली और इस विषय पर समाचार प्रकाशित करने की आवश्यकता क्या है। पत्रकार को तुम ताम करने लगे, इस कदर गुस्सा करने लगे की मानो हाथा पाई पर उतारू हो जायेंगे। खुद तुम कहकर संबोधित कर रहे थे और पत्रकार को तमीज सिखा रहे थे। होता है खुद की विषय संबंधित अज्ञानता बहुत हर्ट करती है। पत्रकार को डराने की कोशिश की जगह अपना ज्ञान बढ़ाते तो अच्छा था। लोकतंत्र में कलम रोकने की ताकत किसी में नहीं होती यह कुछ पदाधिकारी कैसे भूल जाते हैं। खैर, सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूत्रों के अनुसार रांची के शहीद चौक स्थित डाकघर की जमीन के म्यूटेशन के लिए चार बार सदर अंचल कार्यालय को ऑफ लाइन आवेदन भेजा जा चुका है। इसके बावजूद डाकघर विभाग आज तक ऑनलाइन म्यूटेशन तक दाखिल नहीं कर सका है। आखिर ऐसा क्यों? क्या दस्तावेज अधूरे हैं? क्या विभागीय लापरवाही जिम्मेदार है? या फिर मामला वर्षों से फाइलों में दबाकर रखा गया है? क्या अपने घर की जमीन होती तो भी पदाधिकारी इतना लेट करते?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आम नागरिकों को समय पर म्यूटेशन नहीं कराने पर परेशानी झेलनी पड़ती है, तब एक केंद्रीय सरकारी विभाग खुद इस प्रक्रिया को पूरा करने में असफल क्यों है? क्या सरकारी विभागों के लिए अलग नियम हैं और जनता के लिए अलग?
यदि किसी आम आदमी का म्यूटेशन वर्षों तक लंबित रहता तो अधिकारी उसे नियमों का पाठ पढ़ाते। लेकिन यहां खुद सरकारी विभाग की जमीन का नामांतरण वर्षों से अधूरा पड़ा है और जिम्मेदार अधिकारी जवाब देने के बजाय नाराज हो रहे हैं।
म्यूटेशन के मूल सवाल का जवाब आज भी नहीं मिला है। लेकिन इतना जरूर साफ हो गया है कि यह सवाल विभाग को असहज कर रहा है। अब जनता जानना चाहती है कि शहीद चौक स्थित जीपीओ की जमीन का म्यूटेशन आखिर कब होगा, इसके लिए जिम्मेदार कौन है और वर्षों की इस प्रशासनिक लापरवाही पर जवाबदेही कब तय होगी?


