30 साल पुराने डायन हत्या मामले में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: उम्रकैद रद्द, आरोपी बरी
रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने करीब 30 साल पुराने एक चर्चित हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को "संदेह से परे" साबित करने में असफल रहा। इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाता है।
यह फैसला जस्टिस एस. एन. प्रसाद और जस्टिस पी. के. श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने अपीलकर्ता मनसू मांझी उर्फ मांसा मांझी की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 2 सितंबर 1996 का है। उस समय बोकारो जिले के बालीडीह थाना क्षेत्र स्थित वंशिमली गांव में चांदमनी मांझियान नामक महिला की हत्या कर दी गई थी। गांव में महिला पर डायन-बिसाही का आरोप लगाया गया था। बताया गया कि घटना से एक रात पहले इस मुद्दे पर गांव में पंचायत भी हुई थी।
मृतका के बेटे रूपलाल मांझी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। उसने आरोप लगाया था कि मनसू मांझी और रघुनाथ मांझी ने उसकी मां पर टांगी (कुल्हाड़ी) और लाठी से हमला कर हत्या कर दी।
मामले की सुनवाई के बाद वर्ष 1999 में बोकारो की निचली अदालत ने मनसू मांझी को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। वहीं दूसरे आरोपी रघुनाथ मांझी को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण बरी कर दिया गया था।
हाई कोर्ट ने क्यों पलट दिया फैसला?
हाई कोर्ट ने मामले की पूरी सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। अदालत ने कहा कि ऐसे विरोधाभासों के कारण आरोपी के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित नहीं होते।
सबसे अहम गवाह मृतका का बेटा रूपलाल मांझी था, जिसने खुद को घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताया। लेकिन उसकी पत्नी बसंती देवी की गवाही अलग थी। उन्होंने अदालत को बताया कि उन्होंने हत्या होते हुए नहीं देखी थी। उन्हें सिर्फ गांव में शोर सुनाई दिया कि उनकी सास की हत्या हो गई है। इसके बाद वह अपने पति के साथ घटनास्थल पर पहुंचीं। इससे रूपलाल के प्रत्यक्षदर्शी होने के दावे पर सवाल खड़े हो गए।
इसके अलावा हथियार को लेकर भी बड़ा विरोधाभास सामने आया। पुलिस को दिए गए शुरुआती बयान में रूपलाल ने कहा था कि उसकी मां पर टांगी से हमला किया गया था, जबकि अदालत में गवाही के दौरान उसने कहा कि हमला तलवार से हुआ था। हाई कोर्ट ने इस विरोधाभास को बेहद महत्वपूर्ण माना।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में बिपिन कुमार मंडल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2010) और शीलम रमेश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1999) के फैसलों का उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि किसी एक गवाह की गवाही के आधार पर भी सजा दी जा सकती है, लेकिन उसकी गवाही पूरी तरह भरोसेमंद, स्पष्ट और मजबूत होनी चाहिए। यदि गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हों और मामले में दो संभावित दृष्टिकोण सामने आते हों, तो कानून के अनुसार आरोपी के पक्ष वाला दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
आरोपी को मिला संदेह का लाभ
खंडपीठ ने माना कि इस मामले में अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका। गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) दिया गया।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने बोकारो की निचली अदालत द्वारा वर्ष 1999 में सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए मनसू मांझी उर्फ मांसा मांझी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
इस फैसले के साथ हाई कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति को तभी दोषी ठहराया जा सकता है, जब उसके खिलाफ आरोप संदेह से परे पूरी तरह साबित हो जाएं। केवल संदेह या विरोधाभासी गवाही के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती।


